1981 में हमारे दादाजी ने दादर में एक छोटी सी दुकान खोली थी – एक भट्टी, दो कड़ाही और पेड़े की एक पुरानी विधि। आज तीसरी पीढ़ी उसी जगह पर मिठाइयाँ बना रही है।
हमारा तरीका
- शुद्ध घी और रोज़ सुबह आने वाला ताज़ा दूध।
- कोई कृत्रिम रंग नहीं – केसर, पिस्ता और गुलाब से असली रंग।
- मिठाइयाँ रोज़ उतनी ही बनती हैं जितनी उसी दिन बिक सकें।
हमारे यहाँ आने वाले कई ग्राहक बचपन से आ रहे हैं, और अब अपने बच्चों को साथ लाते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी कमाई है।
दुकान रोज़ सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक खुली रहती है, दिवाली के दिनों में देर रात तक।